Wednesday, 25 September 2013

न्यूज रूम का पारा पचास के पार !

जकल न्यूज रूम में बहुत तनाव है, इस तनाव का असर न्यूज रूम के साथियों के चेहरे पर आसानी से पढ़ा जा सकता है। अच्छा ऐसा नहीं है कि ये तनाव किसी एक न्यूज चैनल के दफ्तर में है, सुन रहा हूं कि लगभग सभी चैनलों के हालात एक से हैं। मित्रों से बात होती है तो उनका दर्द सुनकर सच कहूं तो रोंगटे खड़े हो जा रहे हैं। आप सब को पता है कि आजकल मंदी की आड़ में न्यूज चैनलों में बड़े पैमाने पर छटनी हो रही है। जो छटनी के शिकार हुए वो तो सड़क पर आ जाने से दुखी हैं ही, लेकिन जो बच गए, वो उनसे भी ज्यादा परेशान हैं या यों कहिए कि परेशान किए जा रहे हैं। मेरा मानना है कि काम के दौरान गलती होना और संपादक की डांट सुनना दोनों ही काम का एक जरूरी हिस्सा है, लेकिन अब गलती होने पर सबसे बड़ा संपादक भरे न्यूज रूम में मां - बहन की गाली देने लग जाए तो उसके तनाव को भी आसानी से समझा जा सकता है।  

ज्यादातर न्यूज चैनलों में इन दिनों एक ऐसा माहौल बना हुआ है कि कब किसकी नौकरी चली जाएगी, कोई भरोसा नहीं है। किसी को ये लग रहा हो कि उसका ट्रैक रिकार्ड बहुत बढिया है, वो अच्छा काम करता आ रहा है, इसलिए उसका कुछ नहीं होगा तो बहुत बड़ी गलत फहमीं में है। हर न्यूजरूम से पत्रकारों की छुट्टी हो रही है। चलिए छुट्टी हो जाने के बाद सड़क पर आए पत्रकार अपने आगे की राह तलाशने में लगे हुए हैं। कुछ को मिल भी गई, कुछ की बात चीत पाइप लाइन में है, हां कुछ निराश भी हैं, पर अपनी क्षमता के मुताबिक लगे तो हुए हैं। लेकिन सबसे ज्यादा शर्मिंदगी उन्हें झेलनी पड़ रही है, जिनकी बच गई है। बात - बात में उन्हें बताया जा रहा है कि ऐसा नहीं है कि तुम बहुत काबिल हो, इसलिए रह गए। सुरेन्द्र और गजेन्द्र ( काल्पनिक नाम ) तुमसे बेहतर काम जानते भी हैं और करते भी रहे हैं, चाहता तो उन्हें रोककर तुम्हारी छुट्टी कर देता। लेकिन मैने तु्म्हे मौका दिया है। मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि सुरेन्द्र और गजेंद्र बढिया काम कर रहे थे, ये बात संपादक जी लोग जब खुद मान रहे हैं, तो उनकी छुट्टी क्यों कर दी ?

खैर ये सामान्य बात है, ऐसा होता रहता है। कोई आदमी काम बहुत अच्छा जानता हो और लेकिन उसका चेहरा बाँस को पसंद ना हो तो इससे भी संस्थान के काम काज पर बुरा प्रभाव पड़ता है। काम ना जानता हो, लेकिन चेहरे पर चमक हो, इससे उसे देखकर बाँस के चेहरे पर भी चमक रहती है और संस्थान का काम चलता रहता है, गुणवत्ता भले प्रभावित हो। वैसे भी आजकल कामयाबी का पैमाना गुणवत्ता रह भी नहीं गया है। बता रहे हैं कि अब न्यूज रूम में अलग तरह का संकट है। संस्थान को जिस काम के लिए आदमी चाहिए, वो काम जानने वाले की छुट्टी हो गई, जो लोग बचे हैं और वो जो काम जानते हैं, उस काम की अब जरूरत ही नहीं रह गई। एक जमाना था चाहे समाचार पत्र हों या फिर चैनल हर जगह एक बात होती थी, कि आप विशेषज्ञ बनें। किसी भी एक विषय की भरपूर जानकारी होनी चाहिए। लेकिन अब ऐसा नहीं है, कहा जा रहा है कि आप 36 नंबर के "पाना" बनें, मतलब जब जहां जरूरत हो, वहां आप फिट हो सकें। खैर पाना बन रहे हैं, थोड़ा समय लगेगा।

बात काफी पुरानी है, पर मुझे आज भी याद है। जर्नलिज्म की शुरुआत कर रहा था, बड़े-बड़े को अपनी लेखनी से ठिकाने लगाता रहता था, कई बार हमारे स्थानीय संपादक खबर छापने से मना कर देते तो उनसे सवाल जवाब कर लेता था। बात मालिकों तक पहुंचती थी, फैसला कभी उनके हक तो कभी मेरे हक में, ये सब चलता रहता था। एक दिन वो संपादक मुझे  डिनर पर ले गए और समझाने लगे। उम्र में छोटे हो,  इसलिए समझा रहा हूं, ये बात कोई संपादक तुम्हे डिनर कराते हुए नहीं समझाएगा। जो तेजी है, वो भूल जाओ, ज्यादा खतरा लेना सही नहीं है, समय खराब आया तो कोई अगल बगल खड़ा नहीं दिखाई देगा। इसी बात चीत में उन्होंने एक बात कही और ये भी समझाया कि इस मंत्र को गांठ बांध लो। कहा कि रिपोर्टर बनने की कोशिश मत करो, स्टाफर बनो ! मैं समझा नहीं, पूछ लिया कि क्या कहा आपने, रिपोर्टर नहीं स्टाफर बनो। बोले रिपोर्टर तो कोई भी बन सकता है, स्टाफर बनना मुश्किल है। बताने लगे कि स्टाफर वो होता है जो संस्थान की जरूरत के मुकाबले संस्थान के मालिक की इच्छा को प्रमुखता देता है। मालिक आपको कहेगा नहीं कि फलां काम ऐसे होना चाहिए, ये आपको खुद समझना होगा। अगर आप समझ गए तो कामयाब हैं, वरना खुद झेलोगे। आज लग तो रहा है कि उनकी बातों में दम था, लेकिन पछतावा नहीं है।  

अब देखिए, दो महीने पहले की बात है, एक बड़े चैनल में वहां के वरिष्ठ पत्रकार के खिलाफ ऐसा माहौल बनाया कि उन्हें चैनल ही छोड़ना पड़ा। दरअसल किसी भी चैनल में हर वो  आदमी संपादक के निशाने पर रहेगा, जो संपादक से ज्यादा जानकार है या फिर उसका चेहरा संपादक के मुकाबले अधिक टीआरपी वाला है। अगर ऐसा है तो समझ लीजिए कि फिर  आपकी खैर नहीं, आप हमेशा संपादक के निशाने पर ही रहेंगे। हालात ऐसे बन जाएंगे कि एक ना एक दिन आपको जाना ही होगा। या तो फिर संपादक के सामने समर्पण करना होगा, उसे ये अहसास दिलाना होगा कि संपादक जी जो कह रहे हैं वो ही अंतिम सत्य है। उसके आगे पीछे सब गलत है। साफ साफ कहूं तो आपको ये साबित करना होगा कि आप पूरी तरह मूर्ख थे, वो तो संपादक के सानिध्य में आकर थोड़ा बहुत लिखना पढ़ना सीख गए। अगर ये संपादक आपको ना मिले होते तो आज आप कहीं भठ्ठे पर मजदूरी करके किसी तरह पेट पाल रहे होते।  अगर ये क्वालिटी आप में है तो फिर घबराने की कोई जरूरत नहीं है। ऐड़ा बनकर पेडा़ खाते रहिए।

अखबारों का हाल और बुरा है। किसी भी अखबार के संपादक से बात कीजिए, वो स्वीकार करते हैं कि आदमी की कमी है, सीनियर और जानकार की तो बहुत ही ज्यादा जरूरत है। तो साहब रखिए ना, बहुत सारे लोग तो हैं, जो अच्छा काम जानते हैं, कर सकते हैं। लेकिन नहीं रख रहे हैं। वजह बताते हैं कि रुपया कमजोर होने से सबसे ज्यादा मुश्किल समाचार पत्रों को ही तो हो रही है। अखबारी कागज बाहर से मंगाने पड़ते हैं, कहा जा रहा है कीमत लगभग दोगुना हो गई है, रुपया यूं ही कमजोर होता रहा तो छोटे मोटे अखबार तो बंद ही हो जाएंगे। इस हालात में कहा जा सकता है कि अखबारों का हाल भी बहुत अच्छा नहीं है। भाष्कर जैसे बड़े ग्रुप को अगर अपने एडिशन बंद करने पड़ रहे हैं तो दूसरे अखबारों की हालत को आसानी से समझा जा सकता है। इन हालातों में आप समझ सकते हैं कि अखबारों के दफ्तर में भी टीवी के मुकाबले तनाव कोई कम नहीं है। वैसे एक बात बताऊं, अखबारों  में गाली - गलौज तो कामकाज ही एक हिस्सा है। यहां ये सामान्य बात है।





  

16 comments:

  1. रूपये की कमजोरी का असर यहाँ पर भी दिखाई पड़ रहा है !!!

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  2. इतने तनाव का समाचार प्रसारण का अंग नहीं?

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    1. यह सिर्फ समाचार विश्व में नहीं बल्कि सभी जगह एक ही हाल है ...

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  3. वाकई चिंताजनक बात है ..पहली बार पता चला !!

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    1. जी गंभीर चिंता का विषय है..

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  4. सटीक प्रस्तुति-
    आभार आदरणीय-

    मौका देकर कर रहे, सम्पादक एहसान |
    गाली देकर इसलिए, कर जाते अपमान |
    कर जाते अपमान, नरम अपनाय रवैया |
    करें व्यक्ति उत्थान, अन्यथा ता ता थैया |
    तिगनी नाच नचाय, लगा जायेंगे चौका |
    रविकर बंधुवा नाय, मिले बाहर भी मौका-

    ट्रेड यूनियन वाली भाषा में है यह कुण्डलिया -

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  5. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।। त्वरित टिप्पणियों का ब्लॉग ॥

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  6. न्यूज रुम का तनाव अब बाहर भी फैले लगा है .....
    नई पोस्ट अनुभूति : नई रौशनी !
    नई पोस्ट साधू या शैतान

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  7. rupaye ka para girane se har jagah para chadhane laga hai ..sateek vishleshan abhar..

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आपके विचारों का स्वागत है....